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गीता प्रेस, गोरखपुर >> आशा की नयी किरणें

आशा की नयी किरणें

रामचरण महेन्द्र

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :214
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1019
आईएसबीएन :81-293-0208-x

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प्रस्तुत है आशा की नयी किरणें...

बहम, शंका, संदेह


बहम एक अँधेरा है, जो मनुष्यकी चित्त-वृत्तिको भ्रान्त और संकल्प-शक्तिको क्षीण करता है। बहमी आदमी तनिक-तनिक-सी बातोंमें संदेह करता है। भोजन करते समय उसे यह संदेह होता है कि कहीं इसमें विष न मिला हो अथवा अमुक वस्तु खानेसे स्वास्थ्यको हानि पहुँच जायगी। मैंने अमुक वस्तु खा ली इसीलिए स्वास्थ्य नष्ट हो रहा है। दाल मुझे भारी पड़ती है। रात्रिमें दही खाऊँ या नहीं? शंकाशील स्वभावका व्यक्ति यदि किसी यात्रापर जायगा तो सोचेगा कि आज मुहूर्त कौन है? आजका दिन शुभ है अथवा अशुभ? आज चलनेसे पूर्व ज्योतिषी या पण्डितसे पूछ लेना चाहिये। कहीं रेलें न लड़ जायें, जहाज न डूब जाय, अकस्मात् ताँगा और मोटरमें भिड़न्त न हो जाय, बिजली न गिर पड़े अथवा ट्रेनमें आग न लग जाय आदि। वह अपना रुपया किसीको देता है तो बार-बार गिनता है, अनेक प्रश्र करता है, बैंकोंके स्थायित्व तथा फेल हो जानेकी शंका करता है। यदि मेरा रुपया मारा गया तो क्या करूँगा? अमुक-सा रोग उत्पन्न होते ही उसे बहम होता है कि मैं इस रोगसे मर न जाऊँ। कहीं मुझे कोई घातक रोग तो नहीं है? यह रोग किसीके जादू-टोनेका दुष्परिणाम तो नहीं? इस मकानमें किसी प्रेतात्माका प्रभाव तो नहीं?

शंकाशील स्वभावमें दुःखी होने के लिये तनिक-सा सहारा मिलते ही क्षोभ उत्पन्न हो जाता है। मन गलत दिशामें स्वयं अपने विरोधमें अपना शत्रु बन जाता है। बहमी मनुष्य सदा व्याकुल बना रहता है, वह ठीक और गलतका निर्णय नहीं कर पाता। विवेक ही हमारी वह शक्ति है, जो सत्प्रेरणा देती है और उचित निर्णय करनेमें सहायक होती है। यह संरक्षक सत्ता प्रत्येक मनुष्यके अन्तःकरणमें निवास करती है और उसे ठीक स्थितिमें रखती है। मनुष्य यदि विवेकके प्रकाशमें चलता रहे तो बुद्धि निर्णय करनेमें सफल होती है। दु:ख-कष्टोंकी सम्भावना कम होती है। संशय मिट जाते हैं।

शंका, संदेह और बहम मनुष्यकी भारी कमजोरियाँ है। बार-बार इन मानसिक बीमारियोंमें फँसे रहनेसे मनुष्यका मन दुर्बल हो जाता है और ये मनुष्यको किसी भी उत्तरदायित्वपूर्ण पदके उपयुक्त नहीं छोड़तीं। बहमी व्यक्ति धीरे-धीरे अविश्वासी, संकोची और कायर बन जाता है। वह तनिक-सी बातसे भयभीत और झूठी कल्पनाओं और मिथ्या भयोंमें लिप्त रहता है।

अत्यधिक शंका करनेका परिणाम नाश होता है। 'संशयात्मा विनश्यति'। अत्यधिक शंकाशील व्यक्ति चिन्तित और निराश रहता है। उसके मनमें नाना विरोधी विकारों-जैसे ग्लानि, लज्जा, अस्थिरता, कायरता, असंतोष, उदासीनता और कुतर्कका संघर्ष चलता रहता है। उसका जीवन अव्यवस्थित और अशान्त हो जाता है। मानसिक व्याकुलता तथा दुर्बलता बढ़ती जाती है और स्मरण-शक्तिका विनाश हो जाता है।

शंका और संदेहसे मुक्तिके साधन है दृढ़ता, विवेक और मनोबलमें वृद्धि। जिस कार्यके विषयमें सोचें, उसपर शीघ्र निर्णय करें। हर एक दृष्टिकोणसे देखनेके पश्चात् किसी निर्णयपर जल्दी ही आ जायँ। एक बार निश्चय कर उसीपर डटे रहें। गलती और असफलताकी कल्पना न करें। यदि हो जाय तो कारण जानकर उन्हें दूर करें। व्यर्थ ही मिथ्या भ्रमोंसे लिप्त न रहें। जिन वस्तुओं या परिस्थितियोंसे भयभीत है, वे वास्तवमें होनेवाली नहीं है। कल्पित भयोंको मनसे सदाके लिये निकाल दीजिये। निडर बनिये।

आप जीवन-संग्राममें प्रविष्ट हों तो मन, वचन और कर्ममें सामञ्जस्य कर यह भावना कीजिये कि आपका भविष्य अत्यन्त उज्ज्वल होगा और आप अपनी आकांक्षाओंको पूर्णतया प्राप्त करेंगे, आप पूर्ण उन्नतिशील तथा सुखी होंगे, आपको सफलता और विजय प्राप्त होगी, सब प्रकारकी स्फूर्तिदायक सामग्री मिलेगी। सर्वप्रथम इसी भावनाको अपने मनमें स्थिर कीजिये। बार-बार अपने मनको इसी दिशामें अर्थात् अपनी उन्नतिकी ओर सोचनेमें लगाइये। एकान्तमें अपने इन निश्चयोंको और दृढ़ कीजिये।

आप ऐसा सोचिये, मानो आपके मनोरथ क्रमशः आपकी ओर आकृष्ट होकर आपके पास आ रहे हैं। आपकी कठिनाइयाँ सरल होती जा रही हैं। आप क्रमशः शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त करते जा रहे हैं।

अपनी आशाओंको निर्बल न होने दीजिये, प्रत्युत उन्हें कार्यद्वारा और भी दृढ़ बनानेका प्रयत्न कीजिये। कोई बात नहीं, यदि आपको प्रारम्भमें कुछ प्रतिकूलताएँ दृष्टिगोचर होती हैं। प्रत्येक महापुरुषके जीवनमें ऐसा ही हुआ है, किंतु वे सबल-इच्छाशक्तिसे सदा सफल हुए हैं। आपका मार्ग भी शीघ्र ही निष्कण्टक होनेवाला है। यह निश्चय कर लीजिये।

आशापूर्ण कल्याणमय पवित्र चित्रोंको मन-मन्दिरमें सजाना भी एक कला है। यह सफलताका प्रथम पग है। इसमें पारंगत बनकर कठोर कार्यमें आगे बढ़ते हुए सफलताके मीठे फल चखिये। आप चाहे किसी भी क्षेत्रमें आगे बढ़ें, शंकाओंका परित्याग कर पूर्ण दृढ़तासे अग्रसर हों, आरम्भसे ही अपनी विशेषताएँ दिखाइये और शुभ भविष्यको देखनेकी आदत डालिये। आजसे ही शुरू कीजिये।

एकान्तमें यदि कभी अपने प्रति अविश्वास, शंका या संदेहके कायर विचार मनमें आयें, तो सावधान हो जायें। इसके विपरीत प्रचुर मात्रामें आशा, उत्साह, वीरता और साहसके मजबूत विचार मनमें आने दीजिये। अपने-आपको विवेकबुद्धिकी तराजूपर तौलिये। जिस बातको आपकी विवेक-बुद्धि स्वीकार कर ले, उसीको मनमें रखिये। दोषका तिरस्कार कीजिये। तनिक सोचिये, यदि आप छोटी-छोटी-सी बातोंपर भय या संदेह करते रहेंगे और अपने-आपको नहीं सँभालेंगे, अपनी गुप्त शक्तियोंका विकास नहीं करेंगे, तो आपका ठौर-ठिकाना कहाँ होगा? कौन आपको पूछेगा? मिथ्या भयों, कल्पित चिन्ताओं तथा अविचारोंको आज ही सदाके लिये मनसे दूर कर दीजिये।

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    अनुक्रम

  1. अपने-आपको हीन समझना एक भयंकर भूल
  2. दुर्बलता एक पाप है
  3. आप और आपका संसार
  4. अपने वास्तविक स्वरूपको समझिये
  5. तुम अकेले हो, पर शक्तिहीन नहीं!
  6. कथनी और करनी?
  7. शक्तिका हास क्यों होता है?
  8. उन्नतिमें बाधक कौन?
  9. अभावोंकी अद्भुत प्रतिक्रिया
  10. इसका क्या कारण है?
  11. अभावोंको चुनौती दीजिये
  12. आपके अभाव और अधूरापन
  13. आपकी संचित शक्तियां
  14. शक्तियोंका दुरुपयोग मत कीजिये
  15. महानताके बीज
  16. पुरुषार्थ कीजिये !
  17. आलस्य न करना ही अमृत पद है
  18. विषम परिस्थितियोंमें भी आगे बढ़िये
  19. प्रतिकूलतासे घबराइये नहीं !
  20. दूसरों का सहारा एक मृगतृष्णा
  21. क्या आत्मबलकी वृद्धि सम्मव है?
  22. मनकी दुर्बलता-कारण और निवारण
  23. गुप्त शक्तियोंको विकसित करनेके साधन
  24. हमें क्या इष्ट है ?
  25. बुद्धिका यथार्थ स्वरूप
  26. चित्तकी शाखा-प्रशाखाएँ
  27. पतञ्जलिके अनुसार चित्तवृत्तियाँ
  28. स्वाध्यायमें सहायक हमारी ग्राहक-शक्ति
  29. आपकी अद्भुत स्मरणशक्ति
  30. लक्ष्मीजी आती हैं
  31. लक्ष्मीजी कहां रहती हैं
  32. इन्द्रकृतं श्रीमहालक्ष्मष्टकं स्तोत्रम्
  33. लक्ष्मीजी कहां नहीं रहतीं
  34. लक्ष्मी के दुरुपयोग में दोष
  35. समृद्धि के पथपर
  36. आर्थिक सफलता के मानसिक संकेत
  37. 'किंतु' और 'परंतु'
  38. हिचकिचाहट
  39. निर्णय-शक्तिकी वृद्धिके उपाय
  40. आपके वशकी बात
  41. जीवन-पराग
  42. मध्य मार्ग ही श्रेष्ठतम
  43. सौन्दर्यकी शक्ति प्राप्त करें
  44. जीवनमें सौन्दर्यको प्रविष्ट कीजिये
  45. सफाई, सुव्यवस्था और सौन्दर्य
  46. आत्मग्लानि और उसे दूर करनेके उपाय
  47. जीवनकी कला
  48. जीवनमें रस लें
  49. बन्धनोंसे मुक्त समझें
  50. आवश्यक-अनावश्यकका भेद करना सीखें
  51. समृद्धि अथवा निर्धनताका मूल केन्द्र-हमारी आदतें!
  52. स्वभाव कैसे बदले?
  53. शक्तियोंको खोलनेका मार्ग
  54. बहम, शंका, संदेह
  55. संशय करनेवालेको सुख प्राप्त नहीं हो सकता
  56. मानव-जीवन कर्मक्षेत्र ही है
  57. सक्रिय जीवन व्यतीत कीजिये
  58. अक्षय यौवनका आनन्द लीजिये
  59. चलते रहो !
  60. व्यस्त रहा कीजिये
  61. छोटी-छोटी बातोंके लिये चिन्तित न रहें
  62. कल्पित भय व्यर्थ हैं
  63. अनिवारणीयसे संतुष्ट रहनेका प्रयत्न कीजिये
  64. मानसिक संतुलन धारण कीजिये
  65. दुर्भावना तथा सद्धावना
  66. मानसिक द्वन्द्वोंसे मुक्त रहिये
  67. प्रतिस्पर्धाकी भावनासे हानि
  68. जीवन की भूलें
  69. अपने-आपका स्वामी बनकर रहिये !
  70. ईश्वरीय शक्तिकी जड़ आपके अंदर है
  71. शक्तियोंका निरन्तर उपयोग कीजिये
  72. ग्रहण-शक्ति बढ़ाते चलिये
  73. शक्ति, सामर्थ्य और सफलता
  74. अमूल्य वचन

विनामूल्य पूर्वावलोकन

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